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aarakshan kitne saal ke liye tha? जानिए 10 साल की सच्चाई और 2030 तक का पूरा इतिहास

On: August 23, 2026 1:29 PM
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aarakshan kitne saal ke liye tha यह सवाल अक्सर सोशल मीडिया, प्रतियोगी परीक्षाओं और संविधान से जुड़ी चर्चाओं में पूछा जाता है। आम तौर पर इसका जवाब 10 साल बताया जाता है, लेकिन यह जवाब पूरी तस्वीर नहीं बताता। भारतीय संविधान में शुरुआत में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए सीटों के आरक्षण तथा एंग्लो-इंडियन समुदाय के विशेष प्रतिनिधित्व के संबंध में 10 वर्ष की समयसीमा रखी गई थी।

लेकिन यह अवधि 10 साल बाद समाप्त नहीं हुई। संसद ने संविधान संशोधनों के जरिए इस प्रावधान को कई बार आगे बढ़ाया। 2020 में हुए 104वें संविधान संशोधन अधिनियम के बाद लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में SC और ST के लिए सीटों का आरक्षण 25 जनवरी 2030 तक जारी रखने का प्रावधान किया गया।

इसलिए aarakshan kitne saal ke liye tha का सही जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि हम किस तरह के आरक्षण की बात कर रहे हैं। राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए अनुच्छेद 334 में दी गई समयसीमा और सरकारी नौकरी या शिक्षा में आरक्षण के संवैधानिक प्रावधान अलग-अलग हैं।

आरक्षण की शुरुआत कब हुई?

भारत का संविधान 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा अपनाया गया और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। संविधान निर्माताओं ने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के लिए लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं में सीटों के आरक्षण का प्रावधान किया।

इस व्यवस्था का उद्देश्य उन समुदायों को विधायिकाओं में प्रतिनिधित्व देना था, जो ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव और वंचना के कारण राजनीतिक संस्थाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व हासिल नहीं कर पा रहे थे।

संविधान के मूल अनुच्छेद 334 में कहा गया था कि SC और ST के लिए लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं में सीट आरक्षण और एंग्लो-इंडियन समुदाय के नामांकन से संबंधित व्यवस्था संविधान लागू होने के 10 वर्ष बाद समाप्त हो जाएगी। इसका मतलब शुरुआती व्यवस्था 26 जनवरी 1960 के आसपास समाप्त होनी थी। मूल अनुच्छेद 334 में यही 10 वर्ष की अवधि निर्धारित थी।

फिर 10 साल बाद आरक्षण खत्म क्यों नहीं हुआ?

यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। संविधान में 10 वर्ष की अवधि इसलिए रखी गई थी क्योंकि संविधान निर्माताओं को उम्मीद थी कि इस अवधि में सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों में पर्याप्त सुधार हो सकता है।

लेकिन 1960 तक यह उद्देश्य पूरी तरह हासिल नहीं हुआ। इसलिए संसद ने संविधान (आठवां संशोधन) अधिनियम, 1959 के माध्यम से अवधि बढ़ा दी। इसके बाद यह सिलसिला आगे भी चलता रहा।

यही कारण है कि aarakshan kitne saal ke liye tha का केवल “10 साल” वाला जवाब अधूरा माना जाएगा। 10 साल मूल संवैधानिक अवधि थी, लेकिन संसद द्वारा समय-समय पर किए गए संशोधनों के कारण राजनीतिक आरक्षण की अवधि लगातार बढ़ती गई।

आरक्षण की अवधि कैसे बढ़ती गई?

अनुच्छेद 334 में राजनीतिक आरक्षण की अवधि को कई संविधान संशोधनों के माध्यम से आगे बढ़ाया गया। इसका क्रम इस प्रकार समझा जा सकता है:

संविधान संशोधनअवधिआरक्षण/विशेष प्रतिनिधित्व की सीमा
मूल संविधान10 वर्ष1960 तक
8वां संशोधन, 195920 वर्ष1970 तक
23वां संशोधन, 196930 वर्ष1980 तक
45वां संशोधन, 198040 वर्ष1990 तक
62वां संशोधन, 198950 वर्ष2000 तक
79वां संशोधन, 199960 वर्ष2010 तक
95वां संशोधन, 200970 वर्ष2020 तक
104वां संशोधन, 2019SC/ST के लिए 80 वर्ष2030 तक

इस ऐतिहासिक क्रम से स्पष्ट होता है कि aarakshan kitne saal ke liye tha पूछने पर “10 साल” संविधान में निर्धारित शुरुआती अवधि थी, न कि आज तक लागू राजनीतिक आरक्षण की अंतिम अवधि।

23वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1969 ने अनुच्छेद 334 में 20 वर्ष की जगह 30 वर्ष कर दिए थे। यह संशोधन 23 जनवरी 1970 से प्रभावी हुआ।

इसके बाद 45वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1980 ने अवधि को 30 से बढ़ाकर 40 वर्ष किया। अधिनियम को 25 जनवरी 1980 से प्रभावी माना गया।

79वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1999 ने अवधि को 50 वर्ष से बढ़ाकर 60 वर्ष किया और यह बदलाव 25 जनवरी 2000 से प्रभावी हुआ।

104वां संविधान संशोधन क्यों महत्वपूर्ण है?

104वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 इस पूरी बहस में बेहद महत्वपूर्ण है। इसे राष्ट्रपति की मंजूरी जनवरी 2020 में मिली और संबंधित बदलाव 25 जनवरी 2020 से प्रभावी हुआ।

इस संशोधन ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में SC और ST के लिए सीट आरक्षण की अवधि को अगले 10 वर्षों के लिए बढ़ाकर 25 जनवरी 2030 तक कर दिया। वहीं एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में नामांकन की व्यवस्था को आगे नहीं बढ़ाया गया।

केंद्र सरकार ने उस समय कहा था कि SC और ST के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व की जरूरत से जुड़े कारण अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं, इसलिए आरक्षण को और 10 वर्ष जारी रखना आवश्यक समझा गया।

क्या 2026 में SC-ST का राजनीतिक आरक्षण जारी है?

हां। वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में SC और ST के लिए सीटों का आरक्षण 25 जनवरी 2030 तक जारी है। भारत सरकार ने 2026 में भी 104वें संविधान संशोधन को SC/ST सीट आरक्षण को जनवरी 2030 तक बढ़ाने वाला संशोधन बताया है।

इसलिए aarakshan kitne saal ke liye tha का वर्तमान राजनीतिक संदर्भ में जवाब यह नहीं है कि आरक्षण केवल 10 साल के लिए था। मूल अवधि 10 वर्ष थी, लेकिन बाद में संसद ने इसे लगातार बढ़ाया और फिलहाल SC/ST का विधायी सीट आरक्षण 2030 तक जारी है।

क्या सरकारी नौकरी का आरक्षण भी सिर्फ 10 साल के लिए था?

नहीं। यह एक बहुत आम भ्रम है।

संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत राज्य को ऐसे पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी सेवाओं में आरक्षण संबंधी प्रावधान करने की अनुमति है, जो राज्य की राय में सरकारी सेवाओं में पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व नहीं रखते। इसी तरह संविधान के अनुच्छेद 15(4) के तहत सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा SC/ST के उन्नयन के लिए विशेष प्रावधान किए जा सकते हैं।

इसलिए लोकसभा और विधानसभा की सीटों के आरक्षण के लिए अनुच्छेद 334 में निर्धारित समयसीमा को सरकारी नौकरी या शिक्षा में आरक्षण पर सीधे लागू करना सही नहीं है।

केंद्र सरकार की मौजूदा नीति के अनुसार अखिल भारतीय स्तर की खुली प्रतियोगिता वाली सीधी भर्ती में SC के लिए 15 प्रतिशत, ST के लिए 7.5 प्रतिशत और OBC के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है।

शिक्षा में आरक्षण का क्या आधार है?

शिक्षा के क्षेत्र में भी आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था अलग है। संविधान के अनुच्छेद 15 में राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, SC और ST के लिए विशेष प्रावधान करने की अनुमति है।

संविधान का पहला संशोधन अधिनियम, 1951 महत्वपूर्ण था, क्योंकि इसी संशोधन से अनुच्छेद 15(4) जोड़ा गया। इसके आधार पर राज्य शैक्षणिक संस्थानों में पिछड़े वर्गों, SC और ST के उन्नयन के लिए विशेष प्रावधान कर सकता है।

बाद में 103वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 के जरिए आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS के लिए अनुच्छेद 15(6) और 16(6) जोड़े गए। इसके तहत शिक्षा और सरकारी नौकरियों में EWS के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया।

50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा क्या है?

आरक्षण की चर्चा में 50 प्रतिशत की सीमा का अक्सर उल्लेख किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने Indra Sawhney v. Union of India मामले में 16 नवंबर 1992 के फैसले में Article 16(4) के तहत सरकारी नौकरियों में आरक्षण के संदर्भ में सामान्य परिस्थितियों में 50 प्रतिशत की सीमा का सिद्धांत रखा था। हालांकि, इसे संविधान में लिखी हुई ऐसी सीमा नहीं माना जाना चाहिए जो आरक्षण के हर प्रकार पर एक समान लागू होती हो।

बाद में 103वें संविधान संशोधन के जरिए EWS के लिए Article 15(6) और Article 16(6) जोड़े गए। नवंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने 103वें संशोधन की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी।

एंग्लो-इंडियन आरक्षण का क्या हुआ?

मूल अनुच्छेद 334 में SC/ST के लिए सीट आरक्षण के साथ-साथ लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एंग्लो-इंडियन समुदाय के नामांकन का भी प्रावधान था।

लेकिन 104वें संविधान संशोधन अधिनियम में SC/ST के विधायी सीट आरक्षण को 2030 तक बढ़ाया गया, जबकि एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए नामांकन की व्यवस्था को आगे नहीं बढ़ाया गया। वर्तमान अनुच्छेद 334 में SC/ST के लिए 80 वर्ष और एंग्लो-इंडियन प्रतिनिधित्व के लिए 70 वर्ष की अलग-अलग समयसीमा दिखाई देती है।

इसका अर्थ है कि दोनों व्यवस्थाओं को एक ही तरह से देखना सही नहीं है।

आरक्षण से जुड़े महत्वपूर्ण संविधान संशोधन

यदि आप aarakshan kitne saal ke liye tha से जुड़े इतिहास को प्रतियोगी परीक्षा या सामान्य ज्ञान के नजरिए से समझना चाहते हैं, तो कुछ प्रमुख संशोधन याद रखना उपयोगी है।

पहला संविधान संशोधन, 1951: अनुच्छेद 15(4) के जरिए सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा SC/ST के लिए विशेष प्रावधान का संवैधानिक आधार मजबूत हुआ।

आठवां संविधान संशोधन, 1959: अनुच्छेद 334 के तहत राजनीतिक आरक्षण की शुरुआती 10 वर्ष की अवधि को आगे बढ़ाकर 20 वर्ष किया गया।

23वां संविधान संशोधन, 1969: अवधि को 30 वर्ष किया गया।

45वां संविधान संशोधन, 1980: अवधि को 40 वर्ष किया गया।

62वां संविधान संशोधन, 1989: अवधि को 50 वर्ष किया गया।

79वां संविधान संशोधन, 1999: अवधि को 60 वर्ष किया गया।

95वां संविधान संशोधन, 2009: SC/ST सीट आरक्षण की अवधि को 70 वर्ष तक बढ़ाया गया।

103वां संविधान संशोधन, 2019: EWS के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान किया गया।

104वां संविधान संशोधन, 2019: लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में SC/ST सीट आरक्षण को 25 जनवरी 2030 तक बढ़ाया गया और एंग्लो-इंडियन नामांकन की व्यवस्था को आगे नहीं बढ़ाया गया।

तो आखिर सही जवाब क्या है?

अब इस सवाल का सीधा जवाब समझिए। aarakshan kitne saal ke liye tha पूछने पर अगर बात संविधान के मूल राजनीतिक आरक्षण की हो रही है, तो शुरुआत में इसकी अवधि 10 वर्ष रखी गई थी।

लेकिन संसद ने संविधान संशोधनों के जरिए इस अवधि को लगातार बढ़ाया। SC/ST के लिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीट आरक्षण अब 25 जनवरी 2030 तक जारी रहने का संवैधानिक प्रावधान है।

वहीं सरकारी नौकरी और शिक्षा में आरक्षण को “सिर्फ 10 साल के लिए” बताना सही नहीं है। इन क्षेत्रों में आरक्षण अलग-अलग संवैधानिक अनुच्छेदों और कानूनों के आधार पर संचालित होता है।

इसलिए aarakshan kitne saal ke liye tha का सबसे सटीक उत्तर है: मूल संविधान में विधायिकाओं में SC/ST सीट आरक्षण के लिए 10 वर्ष की अवधि थी, लेकिन इसे समय-समय पर संविधान संशोधनों के जरिए बढ़ाया गया और वर्तमान में SC/ST के लिए यह व्यवस्था 25 जनवरी 2030 तक है।

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निष्कर्ष

आरक्षण की अवधि को लेकर सबसे बड़ा भ्रम “10 साल” वाली बात से पैदा होता है। वास्तव में संविधान में 10 वर्ष की शुरुआती समयसीमा मुख्य रूप से लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में SC/ST के सीट आरक्षण तथा एंग्लो-इंडियन समुदाय के विशेष प्रतिनिधित्व से जुड़ी थी।

26 जनवरी 1950 से शुरू हुई यह व्यवस्था 1960 में समाप्त होनी थी, लेकिन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए संसद ने इसे कई बार बढ़ाया। 8वें, 23वें, 45वें, 62वें, 79वें, 95वें और 104वें संविधान संशोधनों ने इसकी अवधि को अलग-अलग चरणों में आगे बढ़ाया।

आज के समय में सबसे जरूरी बात यह समझना है कि राजनीतिक सीट आरक्षण और शिक्षा/सरकारी नौकरी में आरक्षण एक ही संवैधानिक प्रावधान नहीं हैं। इसलिए किसी भी चर्चा में आरक्षण की बात करते समय संबंधित अनुच्छेद, वर्ग और क्षेत्र को स्पष्ट करना जरूरी है।

Mohit Singh Tomar

My name is Mohit Singh Tomar, a passionate student and aspiring journalist from Morena, Madhya Pradesh. With a keen interest in news writing and digital media, I created Khabar Apke Dwar to deliver accurate, timely, and engaging news updates to readers across India. I strive to ensure that every headline reaches you with clarity, credibility, and commitment.

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